प्रवचन कर्ताओं को "कथा' और 'व्यथा' और 'गाथा' से अधिक जोर अथातो ब्रह्म जिज्ञासा" पर देना चाहिये....
कुछ दिनों पूर्व छत्तीसगढ़ में भिलाई-दुर्ग के समीप राजनादगांव गया हुआ था वहां श्रीमद्भागवत कथा चल रही थी, प्रवचन कर्ता मीमांसा पर चर्चा कर रहे थे, मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई और मैं श्रोताओं के बीच में जाकर बैठकर प्रवचन सुनने लगा! किन्तु कुछ ही देर में उन्होंने "मीमांसा" का गलत निरुपण करने लगे .और ...फिर क्या था वही."बाजारु-प्रवचन-कर्ताओं" की भांति आध्यात्मिक, वेदांतीय प्रवचन नाममात्र का एवं .'कथा' के नाम पर 'व्यथा'!
वैदिक-धर्म/गृह्य/आत्म सूत्रों से इतर ....केवल 'राजा, रानियों की जीवन ''गाथा'' का प्रहसनपूर्ण हास,परिहास और चुटकुलों पर केन्द्रीत प्रवचन करने वालों की जमात में शामिल नादगांव में प्रवचन कर रहे प्रवचनकर्ता भी ....नाच-गाना शुरु कर दिये...दिशाहीन कथा को देखकर मैं पुन: अपने गंतव्य को लक्ष्य बनाया.और हमारे साथी मित्र आचार्य रामसहज मिश्र जी ने मुझसे प्रश्न किया की गुरुवर "अथातो ब्रह्म जिज्ञासा" का वेदांत से क्या तात्पर्य है...??
श्री मिश्र जी का प्रश्न बहुत व्यापक था, कोई सामान्य प्रश्न नहीं था...फिर भी अपनी सतही ज्ञान से बताने का यत्न किया......
पूर्व मीमांसा के रचयिता या यूं कहें प्रणेता हैं श्री जैमिनी ऋषि हैं, और पूर्व मीमांसा का पहला सूत्र है "अथातो ब्रह्म जिज्ञासा" जिसमें मनुष्य के कर्तव्याकर्तव्य, पाप-पूण्य का निर्धारण एवं फल, अधर्म के मार्ग पर चलने वालों को पुन: धर्म के मार्ग पर कैसे लाया जाय इस विषय पर गहन चिन्तन किया गया है, साथ ही सरल शब्दों में आध्यात्मिक जागृति का सरल साधन है "पूर्व मीमांसा"!
"उत्तर मीमांसा" के सूत्र-सृजक हैं महर्षि बादरायण (व्यास जी) हैं इसके सूत्रों पर शंकर, रामानुज, माध्वाचार्य जैसे भारतीय अस्वार्थों से लेकर पालडायसन जैसे पश्चिमी विद्वानों के अतिरिक्त कुछ वामपंमथी विचारधारा के कथित दार्शनिकों ने भी अपनी-अपनी स्वभावानुसार अलग-अलग ढंग से टीकाएँ की हैं, जैसा कि इसके प्रथम सूत्र ‘अथातो ब्रह्म जिज्ञासा’ से दर्शित होता है इसका प्रधान विषय ज्ञान और इसके साधनों का विवेचन है। हालॉकि "आश्वालयन गृह्यसूत्र" की महनीयता भी कोई कम नहीं है आचार्य रामसहज जी, क्योंकि जब मैं डोंगरगढ की पहाड़ी पर स्थित मां बम्लेश्वरी के सानिध्य में "बगलामुखी अनुष्ठान" कर रहा था, वहीं मंदिर ट्रस्ट द्वारा संचालित बुक स्टॉल से 'आश्वालयन गृह्यसूत्र' ग्रंथ का अवलोकन किया और इस स्मार्त सूत्रों में मेरी नजर पड़ी इस सूत्र पर....रामसहज जी जरा आप भी देखें....फिर चलते हैं 'अथातो ब्रह्म जिज्ञासा' विषय पर...
- आश्वलायन गृह्यसूत्र -
सांग्रामे समुपोळ्हे राजानं संनाहयेदा त्वाहार्षमन्तरेधीति पश्चाद्रथस्यावस्थाय जीमूतस्येव भवति प्रतीकमिति कवचं प्रयच्छेत् उतरया धनुरुत्तरां वाचयेत्स्वयं चतुर्थीं जपेत् पञ्चम्येषुधिं प्रयच्छेदभिप्रवर्तमाने षष्ठीं सप्तम्याश्वानष्टमीमिषूनवेक्षमाणं वाचयत्यहिरिव भोगैः पर्येति बाहुमिति तलं नह्यमानं। गृ. सू. ३-१२। इति। तथा चावसृष्टा परा पतेतीषून्विसर्जयेद्यत्र बाणाः संपतन्तीति युध्यमानेषु जपेत्संशिष्याद्वा। गृ. सू. ३-१२। अध्यायोपाकरणोत्सर्जनयोर्मण्डलान्त्यहोमे यो नः स्व इत्येषा।अ. गृ. सू. ३-५।
मित्रों पुन: कभी "आश्वालयन-गृह्यसूत्र पर चर्चा करूंगा, क्योंकि यदि "अथातो ब्रह्म-जिज्ञासा) को समझना है तो आश्वालयन को भी समझना पड़ेगा...!
कार्य-कारण के सम्बन्ध की व्याख्या में नवीन दृष्टि अपनाती है। उसके अनुसार कार्य की उत्पत्ति के लिए कारण के अतिरिक्त शक्ति भी स्वीकार करनी चाहिए, क्योंकि शक्ति एक विशिष्ट पदार्थ है। वैदिक कर्मों का फल स्वर्गप्राप्ति है। निरतिशय सुख का ही दूसरा नाम स्वर्ग है। 'स्वर्गकामो जयेत' इस वाक्य से यज्ञसम्पादन का प्रयोजन स्वर्गकामना ही है। कर्मकाण्ड की उपादेयता मीमांसा को मान्य है। अत: वह कर्म को ही ईश्वर मानती है। अतएव प्राचीन मीमांसा निरीश्वरवादी प्रतीत होती है। मीमांसा दर्शन में मोक्ष का भी सूक्ष्म विवेचन हुआ है। 'प्रपंचसम्बन्धविलयो मोक्ष:' यह मीमांसासम्म्त मोक्षलक्षण है। अर्थात् इस जगत् के साथ आत्मा के सम्बन्ध के विनाश का नाम मोक्ष है। वैदिक धर्म के ज्ञान के लिए मीमांसा दर्शन का अनुशीलन अत्यन्त उपादेय है। निष्कर्ष यह है कि 'यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवा:' के अनुसार सृष्टि-रचना, कर्म पर ही आधारित है। 'कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादय:' सफलता सर्वदा कर्म से प्राप्त होती है। मीमांसादर्शन के अनुसार 'जगत को मिथ्या नहीं माना जाता, अपितु वह सत्य' है। यह दर्शन बाह्यार्थसत्तावादी है।
--ज्योतिषाचार्य पण्डित विनोद चौबे, संपादक-''ज्योतिष का सूर्य" मासिक पत्रिका, सड़क नं. २६, शांतिनगर, भिलाई, दुर्ग (छ.ग.)



