''ज्योतिष का सूर्य'' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका

        

Tuesday, June 30, 2015

'सृष्टि' तथा 'लय' का अहसास करते हैं बाबा अमरनाथ

'सृष्टि' तथा 'लय' का अहसास करते हैं बाबा अमरनाथ
जगत का  कल्याण करने वाले बाबा भोलेनाथ जिनको रुद्र भी कहा जाता है रुद्र का अर्थ होता है 'रुतम् द्रावयति इति रुद्र:' अर्थात् 'रुतम्' अर्थात 'दु:खम्' को समाप्त करने वाले और संसार के दु:ख को स्वयं अपने उपर लेकर संसार को सुख प्रदान करने वाले बाबा भोलेनाथ को अमरनाथ भी कहा जाता है, और अमरनाथ शब्द से अलंकृत वही हो सकता है जो वास्तवीक में आधिभौतिक, दैविय तथा प्राकृतिक तौर पर जो पृथ्विवासियों के प्राणवायु को किसी ना किसी रुप में अविरल प्रवाहित होने का वरदान देते हों। जहाँ एक ओर हिमालय की तलहटी में होने वाले हलचल के मुहाने पर कैलाश वास बनाकर सदैव लोगों की रक्षा करते हैं वहीं अमरनाथ के रुप में जमीन से हजारों मीटर उपर निवास करते हुए 'सृष्टि' और 'लय' की परिभाषा का बोध कराकर लोगों में बढ़ रहे पारस्परिक वैमनस्यता, द्वेष, सामाजिक विद्वेष तथा ढ़ोंग आडंबर के अलावा आधुनिक वैज्ञानिकों के लिए चुनौति के रुप में यह सीख दे रहें हैं कि दैव ईश्वरीय सत्ता के समक्ष तुम लोग सदैव नतमस्तक रहोगे। और ठिक वैसा ही अमरनाथ की यात्रा पर बाबा के भक्तों की भींड़ उमड़ पड़ती है जो काफी दुर्गम यात्रा होती है खिर भी आस्था के समक्ष दुरुह मार्ग को भी झूकना ही पड़ता है।

अधिकमास एवं श्रावण का महत्त्व :
इस वर्ष एक माह का अधिक मास 17 जून से आरंभ होकर 16 जुलाई तक रहेगा। अधिक मास को पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है पुरुषोत्तम भगवान शिव को भी कहा जाता है और भगवान विष्णु को भी कहा जाता है अर्थात अधिक मास में हरि एवं हर दोनों की आराधना की जानी चाहिए । 1 अगस्त से श्रावण माह भी आरंभ होगा। श्रावण औरअधिकमास दोनों मांह में रुद्राभिषेक करना चाहिए क्योंकि अलंकार प्रियो कृष्ण: जलधारा प्रियो शिव: । सावन में भी भगवान अमरनाथ की पूजा अर्चना करनी चाहिए। क्रमश: बद्रीनाथ, केदारनाथ के पूजन व दर्शन की जितनी महत्ता है उससे सहस्त्रगुणित फल बाबा अमरनाथ के दर्शन तथा पूजन अभिषेक से प्राप्त होता है।

ज्योतिष एवं पौराणिक संदर्भों का पारस्परिक सामञ्जस्य :

अमरनाथ शिवलिंग हिम से निर्मित होता है। यह शिवलिंग अन्य शिवलिंगों की भांति सालों भर नहीं रहता है। वर्ष के कुछ महीनों में यहां हिम से स्वयं शिवलिंग का निर्माण होता है। स्वयं हिम से निर्मित शिवलिंग होने के कारण इसे 'स्वयंभू हिमलिंग शिवलिंग भी कहा जाता है। आषाढ़ पूर्णिमा से शिवलिंग का निर्माण होने लगता है जो श्रावण पूर्णिमा के दिन पूर्ण आकार में आ जाता है। ज्योतिष में चन्द्र को जलतत्व का ग्रह माना गया है साथ ही भगवान शिव के मस्तक पर चन्द्र के विराजमान होने से भगवान शिव का एक नाम शशिशेखर भी कहा जाता है। चन्द्रमा के घटने-बढऩे के साथ-साथ इस बर्फ का आकार भी घटता-बढ़ता रहता है। श्रावण पूर्णिमा को यह अपने पूरे आकार में आ जाता है और अमावस्या तक धीरे-धीरे छोटा होता जाता है। आस-पास जमा हुआ बर्फ कच्चा होता है जबकि हिम से बना शिवलिंग ठोस होता है। इस स्थान पर आकर ईश्वर के प्रति आस्था मजबूत हो जाती है। इस तरह शिवलिंग का निर्माण सदियों से होता चला आ रहा है।

एक नजर लोक मान्यता पर भी :

लोक मान्यता है कि भगवान शंकर की इस पवित्र गुफा की खोज का श्रेय एक गुर्जर यानि गड़रिये बुटा मलिक को जाता है। एक बार बुटा मलिक पशुओं को चराता हुआ ऊंची पहाड़ी पर निकल गया। वहां उसकी मुलाकात एक संत से हुई। उस संत ने गड़रिये को कोयले से भरा थैला दिया। वह थैला लेकर गड़रिया घर पहुंचा। जब उसने वह थैला खोला तो वह यह देखकर अचंभित हो गया कि उस थैले में भरे कोयले के टुकड़े सोने के सिक्कों में बदल गए। वह गड़रिया बहुत खुश हुआ। वह गड़रिया तुरंत ही उस दिव्य संत का आभार प्रकट करने के लिए उसी स्थान पर पहुंचा। लेकिन उसने वहां पर संत को न पाकर उस स्थान पर एक पवित्र गुफा और अद्भुत हिम शिवलिंग के दर्शन किए। जिसे देखकर वह अभिभूत हो गया। उसने पुन: गांव पहुंचकर यह सारी घटना गांववालों को बताई। सभी ग्रामवासी उस गुफा और शिवलिंग के दर्शन के लिए वहां आए। माना जाता है कि तब से ही इस तीर्थयात्रा की परंपरा शुरू हो गई।

ऋषि कश्यप ने सर्वप्रथम किया था दर्शन बाबा बर्फानी का:

इसी प्रकार पौराणिक मान्यता है कि एक बार कश्मीर की घाटी जलमग्न हो गई। उसने एक बड़ी झील का रूप ले लिया। जगत के प्राणियों की रक्षा के उद्देश्य से ऋषि कश्यप ने इस जल को अनेक नदियों और छोटे-छोटे जलस्रोतों के द्वारा बहा दिया। उसी समय भृगु ऋषि पवित्र हिमालय पर्वत की यात्रा के दौरान वहां से गुजरे। तब जल स्तर कम होने पर हिमालय की पर्वत श्रृखंलाओं में सबसे पहले भृगु ऋषि ने अमरनाथ की पवित्र गुफा और बर्फानी शिवलिंग को देखा। मान्यता है कि तब से ही यह स्थान शिव आराधना का प्रमुख देवस्थान बन गया ।

अमरकथा और बाबा अमरनाथ के स्थान को सिद्ध करता भौगोलिक क्षेत्र:

एक समय की बात है देवी पार्वती के मन में अमर होने की कथा जानने की जिज्ञासा हुई। पार्वती ने भगवान शंकर से अमर होने की कथा सुनाने के लिए कहा। भगवान शंकर पार्वती की बात सुनकर चौंक उठे और इस बात को टालने की कोशिश करने लगे। देवी पार्वती जब हठ करने लगीं तब शिव जी ने उन्हें समझाया कि यह गुप्त रहस्य है जिसे त्रिदेवों के अतिरिक्त कोई नहीं जानता। यह ऐसी गुप्त कथा है जिसे कभी किसी ने अन्य किसी से नहीं कहा है। इस कथा को जो भी सुन लेगा वह अमर हो जाएगा। देवतागण भी इस कथा को नहीं जानते हैं अत: पुण्य क्षीण होने के बाद उन्हें अपना पद रिक्त कर देना पड़ता है और उन्हें पुन: जन्म लेकर पुण्य संचित करना पड़ता है। ऐसे में तुमसे इस कथा को कहने में मै असमर्थ हूं। जब पार्वती शिव के समझाने के बावजूद नहीं मानी तब शिव जी ने पार्वती से अमर होने की कथा सुनाने का आश्वासन दिया।

कथा सुनाने के लिए शिव ऐसे स्थान को ढूंढने लगे जहां कोई जीव-जन्तु न हो। इसके लिए उन्हें श्रीनगर स्थित अमरनाथ की गुफा उपयुक्त लगी। पार्वती जी को कथा सुनाने के लिए इस गुफा में लाते समय शिव जी ने अपने नंदी बैल को 'बैलगाम' में छोड़ दिया, जो अब 'पहलगाम' के रूप में जाना जाता है। इसी प्रकार, चंदनबाड़ी नामक स्थान पर माथे से चंदन उतारा। पिस्सू टॉप नामक स्थान पर पिस्सूओं को, अनन्त नाग में नागों को एवं शेषनाग नामक स्थान पर शेषनाग को ठहरने के लिए कहा। पंचतरणी में शिवजी ने पांच तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश, वायु) को छोड़ दिया। इसके बाद शिव और पार्वती अमारनाथ की गुफा में प्रवेश कर गये।

इस गुफा में शिव माता पार्वती को अमर होने की कथा सुनाने लगे। कथा सुनते.सुनते देवी पार्वती को नींद आ गई और वह सो गईं जिसका शिव जी को पता नहीं चला। शिव अमर होने की कथा सुनाते रहे। इस समय दो सफेद कबूतर शिव की कथा सुन रहे थे और बीच.बीच में गूं-गूं की आवाज निकाल रहे थे। शिव को लग रहा था कि पार्वती कथा सुन रही हैं और बीच.बीच में हुंकार भर रहीं हैं। इस तरह दोनों कबूतरों ने अमर होने की पूरी कथा सुन ली।

कथा समाप्त होने पर शिव का ध्यान पार्वती की ओर गया जो सो रही थीं। शिव जी ने सोचा कि पार्वती सो रही हैं तब इसे सुन कौन रहा था। शिव की दृष्टि तब कबूतरों के ऊपर गया। शिव कबूतरों पर क्रोधित हुए और उन्हें मारने के लिए तत्पर हुए। इस पर कबूतरों ने शिव जी कहा कि हे प्रभु हमने आपसे अमर होने की कथा सुनी है यदि आप हमें मार देंगे तो अमर होने की यह कथा झूठी हो जाएगी। इस पर शिव जी ने कबूतरों को जीवित छोड़ दिया और उन्हें आशीर्वाद दिया कि तुम सदैव इस स्थान पर शिव पार्वती के प्रतीक चिन्ह के रूप निवास करोगो। माना जाता है कि आज भी इन दोनों कबूतरों का दर्शन भक्तों को यहां प्राप्त होता है। जिन्हें श्रद्धालु अमर पक्षी बताते हैं। ऐसी मान्यता भी है कि जिन श्रद्धालुओं को कबूतरों का जोड़ा दिखाई देता हैए उन्हें शिव पार्वती अपने प्रत्यक्ष दर्शनों से निहाल करके उस प्राणी को मुक्ति प्रदान करते हैं।

पुराणों में अमरनाथ और उनका आध्यात्मिक रहस्य:

सिद्घान्तशेखर नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि लिंग पांच तरह के होते हैं- 1-स्वयंभू ( स्वत: प्रकट होना, अमरनाथ आदि) 2-देवपालित (केदारनाथ आदि) 3-ऋषि कृत यानी अवतार महापुरुष ऋषि मुनि द्वारा पूजित (रामेश्वरम् आदि) 4-शिलादिज (पत्थर से बनाए या खुद ब खुद बने नर्मदेश्वर आदि) 5-मानस (श्रद्घा और समयानुसार तत्काल बनाकर पूजित मिट्टी यीनी पार्थिव पूजा )।
स्वयंभू लिंग के दर्शन भर से ही सब पापों का नाश होना बताया गया है-
दृष्ट्वा लिंगं महेशस्य स्वयंभू तस्य पार्वति।
सर्वपापविनिर्मुक्त: परे ब्रह्माणि लीयते॥
इस दृष्टि से बाबा अमरनाथ स्वयंभू लिंग होने से परम पूरय हो जाते हैं। स्वयंभू भी दो तरह के होते हैं : 1-एक बार प्रकट होकर सदा बने रहना, 2-समयानुसार प्रकट होना।

जैसा कि मैने अध्ययन के दौरान काशी में एक शिवलिंग का दर्शन किया करता था। उस शिवलिंग के बारे में आंशिक तौर पर चर्चा करना चाहूंगा।काशी के रामनगर और सोनारपुरा मुहल्ले के मध्य स्थित इस मंदिर विशालकाय एक शिवलिंग है जो तकरीबन 7 से 8 फीट उंचा और काफी बड़े व्यास में स्वयभू शिवलिंग है, जिन्हें तिलभाण्डेश्वर महादेव के रुप में जाना जाता है वे हर वर्ष सावन माह में तिल मात्र बढ़ते रहते हैं जो का दर्शन किया जा सकता है। भारत ही नहीं अपितु अन्य देशों में शिव के अलग-अलग विग्रह को आश्चर्यजनक रुप में सहज ही दर्शन किया जा सकता है। लिंग या देव विग्रह के तौर पर जाने जाते हैं। इनमें भी केवल सावन के महीने में ही क्रमश: बनने वाले अथवा बढऩे वाले या फिर स्वयं ही विलीन होने वाले बाबा अमरनाथ का स्थान महत्त्वपूर्ण है। जहाँ एक ओर सृष्टि को अमरता का दर्शन कराते हैं वहीं दूसरी ओर लय और प्रलय तथा सृष्टि विन्यास का आत्मबोध भी कराते हैं। कुल मिलाकर बाबा अमरनाथ की यात्रा मंगलकारी तो है ही साथ ही मनुष्य को आत्मबोध कराकर सांसारिक मोहमाया से मुक्त होने का मार्ग भी प्रशस्त कराते हैं।

-ज्योतिषाचार्य पण्डित विनोद चौबे, संपादक 'ज्योतिष का सूर्य' राष्ट्रिीय मासिक पत्रिका, भिलाई, दुर्ग (छ.ग.) दूरभाष नं. 09827198828