''ज्योतिष का सूर्य'' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका

        

Sunday, December 14, 2014

अक्षय पूण्य को प्राप्त कराने वाले अतक्षय वट.................वटस्य पत्रस्य पुटे शयानं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि





अक्षय पूण्य को प्राप्त कराने वाले अतक्षय वट.................

वटस्य पत्रस्य पुटे शयानं बालं मुकुन्दं
मनसा स्मरामि........

मित्रों, नमस्कार
अक्षय पूण्य को प्राप्त कराने वाले अतक्षय वट श्री हरि का दर्शन हुआ, आईए  जानने का प्रयास करते हैं अक्षय वट के संक्षिप्त माहात्म्य के बारे में....
करारविन्देन पदारविन्दं मुखारविन्दं विनिवशयन्तम्‌।
वटस्य पत्रस्य पुटे शयानं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि॥

शूलपाणि महेश्वर इस वृक्ष की रक्षा करते हैं, तव वटं रक्षति सदा शूलपाणि महेश्वरः। पद्‌म पुराण में अक्षयवट को तीर्थराज प्रयाग का छत्र कहा गया है-

छत्तेऽमितश्चामर चारुपाणी सितासिते यत्र सरिद्वरेण्ये।
अद्योवटश्छत्रमिवाति भाति स तीर्थ राजो जयति प्रयागः॥

अक्षयवट का धार्मिक महत्व सभी शास्त्र-पुराणों में कहा गया है। चीनी यात्री ह्वेनसांग प्रयागराज के संगम तट पर आया था। उसने अक्षयवट के बारे में लिखा है- नगर में एक देव मंदिर (पातालपुरी मंदिर) है। यह अपनी सजावट और विलक्षण चमत्कारों के लिए प्रसिद्ध है। मंदिर के आंगन में एक विशाल वृक्ष (अक्षयवट) है, जिसकी शाखाएं और पत्तियां दूर-दूर तक फैली हैं।
अक्षयवट का पहला उल्लेख वाल्मीकि रामायण में मिलता है। भारद्वाज ऋषि ने भगवान राम से कहा था- नर श्रेष्ठ तुम दोनों भाई गंगा और यमुना के संगम पर जाना, वहां से पार उतरने के लिए उपयोगी घाट में अच्छी तरह देखभाल कर यमुना के पार उतर जाना। आगे बढ़ने पर तुम्हें बहुत बड़ा वट वृक्ष मिलेगा। उसके पत्ते हरे रंग के हैं। वह चारों ओर से दूसरे वृक्षों से घिरा हुआ है। उसका नाम श्यामवट है। उसकी छाया में बहुत से सिद्ध पुरुष निवास करते हैं। वहां पहुंचकर सीता को उस वृक्ष से आशीर्वाद की याचना करनी चाहिए। यात्री की इच्छा हो तो यहां कुछ देर तक रुके या वहां से आगे चला जाए।